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आर-पार की लड़ाई के मूड में बदरी-केदार के अस्थाई कर्मचारी

by badhtauttarakhand
  • नियमितीकरण और समान वेतन की मांग पर क्रमिक अनशन शुरू
  • एक सप्ताह का अल्टीमेटमय फिर अनिश्चितकालीन हड़ताल
  • 15-20 साल सेवा के बाद भी स्थायी नौकरी नहीं

गोपेश्वर (चमोली)। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के बदरीनाथ-केदारनाथ धाम में वर्षों से सेवाएं दे रहे करीब तीन सौ अस्थाई कर्मचारियों ने अब अपने हक के लिए आंदोलन तेज कर दिया है। नियमितीकरण, वन टाइम सेटलमेंट और समान कार्य के लिए समान वेतन की मांग पर कर्मचारी क्रमिक अनशन पर बैठ गए हैं। कर्मचारियों ने दो टूक चेतावनी दी है कि एक सप्ताह के भीतर मांगों पर ठोस निर्णय नहीं हुआ तो कामकाज ठप कर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर देंगे। इससे दोनों धामों में व्यवस्थाएं प्रभावित होने की आशंका है।

केदारनाथ धाम में 13 अक्टूबर से धरना शुरू हो चुका है, जबकि बदरीनाथ मंदिर और मंदिर समिति के अधीन अन्य मंदिरों के अस्थायी कर्मचारियों ने 14 अक्टूबर से आंदोलन शुरू किया। कर्मचारी प्रतिदिन सुबह 11 से दोपहर एक बजे तक मंदिर परिसर में क्रमिक अनशन शुरू कर दिया है।

सीएम की घोषणा भी बेअसर, दो साल से इंतजार

कर्मचारियों का कहना है कि वे 15 से 20 वर्षों से धामों और मंदिर समिति के अधीनस्थ मंदिरों में सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन आज तक उनके नियमितीकरण और वेतन संबंधी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हुआ। केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव के दौरान 11 अक्टूबर 2024 को अगस्त्यमुनि में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अस्थायी कर्मचारियों के लिए समान वेतन और वन टाइम सेटलमेंट की व्यवस्था करने की घोषणा की थी। कर्मचारियों का आरोप है कि घोषणा के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

12 दिवंगत कर्मियों के परिवारों को मदद नहीं

आंदोलनकारियों ने सेवा के दौरान दिवंगत हुए करीब 12 कर्मचारियों के आश्रितों को आर्थिक सहायता नहीं मिलने पर भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि इस संबंध में मंदिर समिति के प्रभारी अधिकारी को ज्ञापन देकर समस्या के समाधान की मांग की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

एक सप्ताह बाद कामकाज ठप करने की चेतावनी

कर्मचारियों ने फिलहाल एक सप्ताह तक प्रतिदिन दो घंटे क्रमिक अनशन जारी रखने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि तय अवधि में मांगों पर सकारात्मक फैसला नहीं हुआ तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे। अब निगाहें मंदिर समिति प्रबंधन और शासन पर हैं कि वे कर्मचारियों के आंदोलन को समाप्त कराने के लिए क्या कदम उठाते हैं।